दिन, महीने, साल और नए शहरों में खानाबदोशी में, वो जगह जो अपनी सी लगती है वहाँ अब भी घर के सामने बिखरे झील में चाँद लटकने को बेताब रहता है, हाथ की धुलाई से तैयार, नील डाला हुआ सफ़ेद हाफ शर्ट पहन कर छत पे खड़ा पाता हूँ खुद को, मछरों का एक झुण्ड सर पे नाचता है और अब भी अंतराक्षरी के बीच पुराने फ़िल्मी गीतों के मुखड़ो को दिल की दीवारों पे उकेरती है. किसी ऐसी एक शाम को गीतों के बीच कुछ सेकण्ड्स तक मुझे देखते हुए कहा था - “की बात छियै, आई बहुत स्मार्ट लाइग रहल छीहीन"अपने उस स्मार्टनेस को ढूंढता हूँ। नयी गलियों में, नए चेहरों में, और वो गीत भी बजते हैं कानों में - ये शाम मस्तानी … मदहोश किये जाए। … मुझे डोर कोई खींचे। . तेरी ओर लिए जाए……