इंटरनेट पर कच्चे पक्के पन्नों के बीच किसी विदेशी लेखक के निबन्ध में पढ़ लिया - पांच साल की उम्र की बाद मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन सिर्फ बाहरी दुनिया के लिए होता है, अकेले में हम सब पांच साल के हैं। ऐसा लगा जैसे शर्म से बचा लिया उस लेखक ने,
पांच साल की उम्र वालीं गली के शिवालय वाले पंडित जी ने जब से कह दिया कि शिव जी का नैवेद्य उठाते नहीं, तब से तो जब दिल करता बताशे खाने का, शिवालय पंहुच जाता और चूहों से छीन कर जूठे बताशे स्कूल के बस्ते में भर लेता था।
यहां दफ्तर
के सालाना रूटीन चेकअप में डॉक्टर को आश्चर्य हुआ कि मैंने कोई वैक्सीनेशन नहीं लिया बचपन में, और मैंने उसे वो चूहों वाली बात नहीं बताई, ये भी नहीं बताया कि पांच साल की उम्र के बाद स्वभाव नहीं बदलता