कभी छुआ होगा मुझे
छाप यूँ लगी है
जैसे हज़ारों साल पहले
छाप यूँ लगी है
जैसे हज़ारों साल पहले
लिखी पत्थरों पे श्लोक होतें है।
कहीं छुआ होगा मुझे
जैसे बाथरूम से नन्हा सा बच्चा
जैसे बाथरूम से नन्हा सा बच्चा
अपने पांवों के निशाँ छोड़ता
माँ वाले कमरे की तरफ दौड़ लगाए।
कहीं छुआ है मुझे
जैसे दादी अपने भन्सा घर में
जैसे दादी अपने भन्सा घर में
लकड़ी की आंच के और अपने प्यारे पांवों को
छठ के खीर पत्तल के बीच रखती है।
जहां भगवान् नहीं होता
उनके पाँव के छाप होते हैं।
और असर यूँ किया है
कि अकेला दुनियां की तन्हाई वाला ज़हर
कि अकेला दुनियां की तन्हाई वाला ज़हर
एक सांस में भर के
माफ़ी के साथ
हौले छोड़ देता हूँ
माफ़ी के साथ
हौले छोड़ देता हूँ
आसमान के उस टुकड़े के लिए
जो अभी इस दुनिया की है
और कल हमारी होगी!
जो अभी इस दुनिया की है
और कल हमारी होगी!
