Vijay Jha's

Portfolio
कभी छुआ होगा मुझे
छाप यूँ लगी है
जैसे हज़ारों साल पहले 
लिखी पत्थरों पे श्लोक होतें है।

कहीं छुआ होगा मुझे
जैसे बाथरूम से नन्हा सा बच्चा 
अपने पांवों के निशाँ छोड़ता
 माँ वाले कमरे की तरफ दौड़ लगाए।

कहीं छुआ है मुझे
जैसे दादी अपने भन्सा घर में 
लकड़ी की आंच के और अपने प्यारे पांवों को 
छठ के खीर पत्तल के बीच रखती है। 

जहां भगवान् नहीं होता
 उनके पाँव के छाप होते हैं।

और असर यूँ किया है
कि अकेला दुनियां की तन्हाई वाला ज़हर
एक सांस में भर के
माफ़ी के साथ
हौले छोड़ देता हूँ

आसमान के उस टुकड़े के लिए
जो अभी इस दुनिया की है
और कल हमारी होगी!
द चार्मर्

राजस्थान की रंग बिरंगी गलियों में पगड़ी पहने गाने वाला वो चार्मर जो कबीर प्रोजेक्ट पे अपने टूटे दांत और शीशे जड़ी सारंगी के साथ पुकारता था अकेला ...
"चक्की चल रही,कबीरा बैठा रोइ
दुइ पाटन के बीच, साबुत बचा ना कोई" 

कोई कबीर नहीं........, कोई कबीर का मुरीद नहीं। 
कबीर वहम होगा उसका?

फिर एक बार भटक के शराबखाने आ गया, आदत से मज़बूर एक और अलख लगाई....

"कबीरा जब पैदा हुआ तो जग हंसा हम रोये......"

फिर सब कबीर, सब कबीर के मुरीद और ये दुनिया एक वहम

ये कबीर पीचर और पेग्स के साथ ही सर्व होता है क्या!!
there were guys who used to bring festivals before winter every year. some with colorful balloons and girly stuff hanging from bamboo or shop on wheel.   parents were forced to give pocket money so that we could buy our share of festival - i guess they did not want to create bad impression in front of the gods.
"जय माता दी " was tuned in all imaginable combinations with support from bollywood.  classified actions of teenage girls and denim wearing guys on hero ranger were overlooked during  सांझ के दीप. and tobacco chewing guy earned some respect by fasting.   i guess they all boasted- godess has come to forgive all for 10 days.

#दुर्गा_पूजा_समिति  #पंडाल_में_आएं   #रोजाना_४_शो_दुर्गा_पूजा_के_शुभ_अवसर_पे #चंदा_देना_होगा
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