कुछ कहानियाँ हम कब से लिखते आ रहे हैं इसका कोई हिसाब नहीं, कोई खबर नहीं, कोई इल्म तक नहीं। बर्फबारी की सफ़ेद रुई जैसी फाहों की तरह वक़्त इन्हें तारिख में तब्दील कर छुपाता चला गया। और अब उन्ही दास्तानों का ख्वाब देख हम कभी दिल जला लेते हैं तो कभी गला।
कितने ग़ालिब और मीर के शेर आवारा लड़खड़ाये होंगे, शीशे के ग्लासों की हमक़दमी के कोलाहल के दौरान। उन बिखरे शेरों को तलाश के संजोना चाहता हूँ जैसे दीवाली की अगली सुबह कोई चौखट से बुझे दिए उठा मिटी की चारदीवारी पर रखता हो अगली दीवाली को रोशन करने की ख्वाहिश में......