बरसात
कहीं भी रहो , बरसात आती है तो कुछ अंदर तक भींगता है , वो सब भी महसूस होता है जिसके होने का अहसास कई महीनो सालों से हुआ नहीं था , सारे पात्र ज़िंदा होते हैं वास्तिविक भूत काल से निकल कर वर्तमान के कल्पकथा में। कॉलेज में लिखे गए अधूरे नाटकों को एक सांस में पूरा करने का मन करता है। बड़ी बेशर्म हिम्मत है हमारी, या फिर हम सिर्फ बरसाती कलाकार हैं।