Vijay Jha's

Portfolio
कभी छुआ होगा मुझे
छाप यूँ लगी है
जैसे हज़ारों साल पहले 
लिखी पत्थरों पे श्लोक होतें है।

कहीं छुआ होगा मुझे
जैसे बाथरूम से नन्हा सा बच्चा 
अपने पांवों के निशाँ छोड़ता
 माँ वाले कमरे की तरफ दौड़ लगाए।

कहीं छुआ है मुझे
जैसे दादी अपने भन्सा घर में 
लकड़ी की आंच के और अपने प्यारे पांवों को 
छठ के खीर पत्तल के बीच रखती है। 

जहां भगवान् नहीं होता
 उनके पाँव के छाप होते हैं।

और असर यूँ किया है
कि अकेला दुनियां की तन्हाई वाला ज़हर
एक सांस में भर के
माफ़ी के साथ
हौले छोड़ देता हूँ

आसमान के उस टुकड़े के लिए
जो अभी इस दुनिया की है
और कल हमारी होगी!
Next PostNewer Post Previous PostOlder Post Home